‘अस्थिर सुख पर दुख की छाया’ पंक्ति में ‘दुख की छाया’ किसे कहा गया हैं और क्यों?
अस्थिर सुख पर दुःख की छाया अस्थिर सुख दुःख की छाया विनाश की आशका को कहा गया है वे अपनी सुख – सुविधा के खोने मात्र से भयभीत रहते है उनका सुख अस्थिर है जिनके पास आवश्यकता से अधिक रहेता है जो समाज कि भलाई के लिए आवश्यक है और उसे खोने मात्र कि आशका उन्हें दुखी करती है I
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते ‘ पंक्ति में ‘ विप्लव-रव ‘ से क्या तात्पर्य है ? ‘ छोटे ही है हैं शोभा पाते ‘ एसा क्यों कहा गया है ?
व्याख्या कीजिए-
(क) तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया-
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया-
(ख) अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
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