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Chapter 1 : Devsena Ka Geet
जयशंकर पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ (Jayashankar Prasaad)​ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित "देवसेना का गीत" à¤à¤• सशकà¥à¤¤ कविता है जिसमें पà¥à¤°à¥‡à¤®, तà¥à¤¯à¤¾à¤— और समरà¥à¤ªà¤£ का अदà¥à¤à¥à¤¤ समनà¥à¤µà¤¯ है। देवसेना अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯ के लिठअपनी à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं को गीत के माधà¥à¤¯à¤® से पà¥à¤°à¤•ट करती है। वह अपने पà¥à¤°à¥‡à¤® में पूरà¥à¤£ समरà¥à¤ªà¤£ और तà¥à¤¯à¤¾à¤— का à¤à¤¾à¤µ रखती है। देवसेना अपने पà¥à¤°à¥‡à¤® को किसी सांसारिक बंधन में बाà¤à¤§à¤¨à¤¾ नहीं चाहती, बलà¥à¤•ि वह इसे ईशà¥à¤µà¤° पà¥à¤°à¤¦à¤¤à¥à¤¤ मानती है। यह पà¥à¤°à¥‡à¤® à¤à¤• साधना के रूप में पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ किया गया है, जो सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आतà¥à¤®à¤¾ की शà¥à¤¦à¥à¤§à¤¿ की ओर संकेत करता है।
देवसेना का पà¥à¤°à¥‡à¤® उसकी आतà¥à¤®à¤¾ की गहराई से उपजा है, और यह पà¥à¤°à¥‡à¤® की पवितà¥à¤°à¤¤à¤¾ और उचà¥à¤šà¤¤à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¤¾ है।
Chapter 2 : Geet Gane Do Mujhe Aur Saroj Smriti
"गीत गाने दो मà¥à¤à¥‡" में कवि 'सूरà¥à¤¯à¤•ानà¥à¤¤ तà¥à¤°à¤¿à¤ªà¤¾à¤ ी निराला (Sooryakaant Tripaathee Niraala)' ने अपने हृदय की अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ और रचनातà¥à¤®à¤•ता के माधà¥à¤¯à¤® से दरà¥à¤¶à¤¾à¤¯à¤¾ है। कवि चाहता है कि उसे गीत गाने का अवसर दिया जाठताकि वह अपनी à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं को पूरà¥à¤£à¤¤à¤¾ से पà¥à¤°à¤•ट कर सके। वहीं, "सरोज सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿" में कवि अपनी बहन सरोज की सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को संजोता है, जो अब इस संसार में नहीं है। सरोज के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ कवि का पà¥à¤°à¥‡à¤® और उसकी यादों से जà¥à¤¡à¤¼à¥€ हà¥à¤ˆ संवेदनाà¤à¤ इस कविता में सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ रूप से à¤à¤²à¤•ती हैं।
कवि के मन में अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯à¤œà¤¨à¥‹à¤‚ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ करà¥à¤£à¤¾, पà¥à¤¯à¤¾à¤°, और सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ की गहरी छाप है, जो उनके जीवन को दिशा देने में महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤¤à¥€ है।
Chapter 3 : Yah Deep Akela
"यह दीप अकेला" कविता में दीपक का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• रूप में पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया गया है। दीपक à¤à¤•ांत में जलता है, अपने चारों ओर अंधकार को समापà¥à¤¤ करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करता है। यह कविता तà¥à¤¯à¤¾à¤—, सेवा, और आतà¥à¤®-बलिदान की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥€ है। दीपक अकेला होकर à¤à¥€ समाज को उजाला देने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करता है। यह उन वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है जो अपने सà¥à¤µà¤¾à¤°à¥à¤¥ को à¤à¥‚लकर समाज की à¤à¤²à¤¾à¤ˆ में लगे रहते हैं।
कविता के माधà¥à¤¯à¤® से कवि सचà¥à¤šà¤¿à¤¦à¤¾à¤¨à¤‚द हीरानंद वातà¥à¤¸à¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤¨ 'अजà¥à¤žà¥‡à¤¯' (Sachchidaanand Heeraanand Vaatsayaayan Agyey) यह संदेश देना चाहते हैं कि हमें अपनी कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हà¥à¤ दूसरों के जीवन को रोशन करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करना चाहिà¤à¥¤
Chapter 4 : Banaras aur Disha
इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में बनारस शहर का सौंदरà¥à¤¯, धारà¥à¤®à¤¿à¤•ता और सांसà¥à¤•ृतिक धरोहर का वरà¥à¤£à¤¨ किया गया है। बनारस की गलियाà¤, वहाठके मंदिर, घाट, और गंगा नदी का अदà¥à¤à¥à¤¤ दृशà¥à¤¯ लेखक के मन को मोह लेते हैं। इस शहर का à¤à¤¤à¤¿à¤¹à¤¾à¤¸à¤¿à¤• महतà¥à¤µ और यहाठकी धारà¥à¤®à¤¿à¤• परंपराà¤à¤ इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में पà¥à¤°à¤®à¥à¤–ता से उà¤à¤°à¤¤à¥€ हैं। बनारस को à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सांसà¥à¤•ृतिक राजधानी माना जाता है और इसके वातावरण में à¤à¤• विशेष पà¥à¤°à¤•ार की आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤•ता है।
लेखक 'केदारनाथ सिंह (Kedarnath Singh)' बनारस के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अपने पà¥à¤°à¥‡à¤® और उस जगह की महतà¥à¤¤à¤¾ को वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ करता है, जिससे यह सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ केवल à¤à¤• शहर नहीं, बलà¥à¤•ि à¤à¤• आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• सà¥à¤¥à¤² के रूप में उà¤à¤°à¤¤à¤¾ है।
Chapter 5 : Ek Kam aur Satya
"à¤à¤• कम" और "सतà¥à¤¯" में जीवन के गहरे सतà¥à¤¯ और मानवीय संबंधों का विशà¥à¤²à¥‡à¤·à¤£ किया गया है। यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ यह संदेश देता है कि सतà¥à¤¯ को समà¤à¤¨à¥‡ के लिठवà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को अपने à¤à¥€à¤¤à¤° à¤à¤¾à¤‚कना पड़ता है। इसे समà¤à¤¨à¥‡ में हमें कई बार कठिनाइयाठआती हैं, परंतॠयह सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆ ही हमारे जीवन को à¤à¤• नई दिशा देती है। सतà¥à¤¯ का यह सà¥à¤µà¤°à¥‚प हमें अपनी गलतियों और कमियों को सà¥à¤µà¥€à¤•ार करने की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ देता है।
लेखक विषà¥à¤£à¥ खरे (Vishnu Khare) का मानना है कि जीवन में सतà¥à¤¯ और ईमानदारी को अपनाने से हम अपने जीवन को संतà¥à¤²à¤¿à¤¤ और सà¥à¤–द बना सकते हैं।
Chapter 6 : Vasant Aaya
"वसंत आया" à¤à¤• ऋतॠआधारित कविता है, जो वसंत के आगमन के साथ पà¥à¤°à¤•ृति के पà¥à¤¨à¤°à¥à¤œà¤¨à¥à¤® और नठजीवन का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। वसंत ऋतॠको कवि रघà¥à¤µà¥€à¤° सहाय (Raghuveer Sahay) ने à¤à¤• आनंदमयी समय के रूप में देखा है, जिसमें पेड़-पौधे, पकà¥à¤·à¥€ और अनà¥à¤¯ जीव-जंतॠà¤à¤• नई ऊरà¥à¤œà¤¾ से à¤à¤° जाते हैं। वसंत का सà¥à¤µà¤¾à¤—त करते हà¥à¤ कवि उसे पà¥à¤°à¥‡à¤®, सौंदरà¥à¤¯ और आनंद की ऋतॠके रूप में पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करता है।
यह कविता हमें जीवन में नई शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤, सकारातà¥à¤®à¤•ता और उतà¥à¤¸à¤¾à¤¹ का महतà¥à¤µ बताती है।
Chapter 7 : Bharat Ram Ka Prem
"à¤à¤°à¤¤ राम का पà¥à¤°à¥‡à¤®" में à¤à¤—वान राम और उनके à¤à¤¾à¤ˆ à¤à¤°à¤¤ के बीच गहरे पà¥à¤°à¥‡à¤® और समरà¥à¤ªà¤£ का वरà¥à¤£à¤¨ है। à¤à¤°à¤¤ ने राम के वनवास जाने के बाद अयोधà¥à¤¯à¤¾ का राजà¥à¤¯ संà¤à¤¾à¤²à¤¨à¥‡ के बजाय राम के चरणों की खड़ाऊठको सिंहासन पर रखा और खà¥à¤¦ à¤à¤• तà¥à¤¯à¤¾à¤—ी जीवन जीया। तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ (Tulsidas) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ à¤à¥à¤°à¤¾à¤¤à¥ƒ पà¥à¤°à¥‡à¤® की à¤à¤• सà¥à¤‚दर मिसाल पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करता है, जिसमें à¤à¤°à¤¤ का राम के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ आदर, पà¥à¤°à¥‡à¤®, और समरà¥à¤ªà¤£ दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤—ोचर होता है। यह रचना à¤à¤¾à¤ˆ-à¤à¤¾à¤ˆ के अटूट रिशà¥à¤¤à¥‡ और सचà¥à¤šà¥‡ पà¥à¤°à¥‡à¤® की उचà¥à¤šà¤¤à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥€ है।
Chapter 8 : Barahmasa
"बारहमासा" में बारह महीनों का वरà¥à¤£à¤¨ है, जो à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ गà¥à¤°à¤¾à¤®à¥€à¤£ जीवन का अà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ अंग है। इसमें हर महीने के बदलते मौसम, पà¥à¤°à¤•ृति के सà¥à¤µà¤°à¥‚प और जीवन पर उनके पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ का चितà¥à¤°à¤£ किया गया है। à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ किसानों और गà¥à¤°à¤¾à¤®à¥€à¤£ जनजीवन के लिठबारहमासा बहà¥à¤¤ मायने रखता है कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह उनके जीवन से गहराई से जà¥à¤¡à¤¼à¤¾ है।
मलिक मà¥à¤¹à¤®à¥à¤®à¤¦ जायसी (Malik Muhammad Jayasi) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित इस रचना के माधà¥à¤¯à¤® से ऋतॠचकà¥à¤° का महतà¥à¤µ और à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति में उसकी à¤à¥‚मिका सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ होती है।
Chapter 9 : Vidyaapati Ke Pad
विदà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¤à¤¿ के पदों में à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ और पà¥à¤°à¥‡à¤® का अदà¥à¤à¥à¤¤ समनà¥à¤µà¤¯ देखने को मिलता है। विदà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¤à¤¿ अपने पदों के माधà¥à¤¯à¤® से à¤à¤—वान और पà¥à¤°à¥‡à¤®à¥€ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ गहरे à¤à¤¾à¤µà¥‹à¤‚ को पà¥à¤°à¤•ट करते हैं। इन पदों में उनकी à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ का à¤à¤• सà¥à¤µà¤°à¥‚प है जो à¤à¤—वान के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ गहरी आसà¥à¤¥à¤¾ और पà¥à¤°à¥‡à¤® की à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ से à¤à¤°à¤¾ हà¥à¤† है।
विदà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¤à¤¿ का यह à¤à¤¾à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ अंदाज उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपने समय के à¤à¤• महान कवि के रूप में सà¥à¤¥à¤¾à¤ªà¤¿à¤¤ करता है।
Chapter 10 : Ramchandrachandrika
"रामचंदà¥à¤°à¤¿à¤•ा" à¤à¤• महाकावà¥à¤¯ है जिसमें à¤à¤—वान राम के आदरà¥à¤¶ चरितà¥à¤° और उनकी जीवन यातà¥à¤°à¤¾ का वरà¥à¤£à¤¨ किया गया है। यह कावà¥à¤¯ रचना राम के महान वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ, उनकी मरà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾ और उनके चरितà¥à¤° की शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ ता को महिमामंडित करती है। इसके माधà¥à¤¯à¤® से कवि केशवदास (Keshavdas) ने यह संदेश दिया है कि à¤à¤—वान राम केवल à¤à¤• देवता नहीं, बलà¥à¤•ि à¤à¤• आदरà¥à¤¶ पà¥à¤°à¥à¤· हैं, जिनसे समाज को पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ मिलती है।
Chapter 11 : Kavit aur Savaiya
"कवितà¥à¤¤ और सवैया" हिंदी कावà¥à¤¯ के दो महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ छंद हैं, जिनका पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कवियों दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ सà¥à¤‚दरता और विचारों की गहराई को अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ करने के लिठकिया जाता है। कवितà¥à¤¤ छंद में शबà¥à¤¦à¥‹à¤‚ की लय और à¤à¤¾à¤µà¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹ महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ होता है, जो शà¥à¤°à¥‹à¤¤à¤¾ के मन में गहरी छाप छोड़ता है। सवैया छंद में गेयता और पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹ के साथ-साथ विशेष पà¥à¤°à¤•ार का अनà¥à¤ªà¥à¤°à¤¾à¤¸ होता है, जिससे कावà¥à¤¯ में आकरà¥à¤·à¤£ आता है।
इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में कवि 'घनानंद (Ghananand)' ने इन छंदों के माधà¥à¤¯à¤® से पà¥à¤°à¥‡à¤®, à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ और निसà¥à¤µà¤¾à¤°à¥à¤¥à¤¤à¤¾ का महतà¥à¤µ समà¤à¤¾à¤¯à¤¾ है।
Chapter 12 : Premghan Ki Chhaya Smriti
"पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤˜à¤¨ की छाया सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿" कवि की अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ गहरे पà¥à¤°à¥‡à¤® की अà¤à¤¿à¤µà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ है। इसमें कवि 'रामचंदà¥à¤° शà¥à¤•à¥à¤² (Ramchandra Shukal)' अपने पà¥à¤°à¤¿à¤¯ को याद करते हà¥à¤ उसके साथ बिताठगठकà¥à¤·à¤£à¥‹à¤‚ को सà¥à¤®à¤°à¤£ करता है। पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤˜à¤¨ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ उसकी à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤à¤ अतà¥à¤¯à¤‚त गहरी और मारà¥à¤®à¤¿à¤• हैं, जो इस कविता में सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ होती हैं। कवि का मानना है कि पà¥à¤°à¥‡à¤® न केवल à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त अनà¥à¤à¤µ है, बलà¥à¤•ि यह आतà¥à¤®à¤¾ का à¤à¤¸à¤¾ अंश है जो जीवन में सकारातà¥à¤®à¤•ता और संतोष लाता है।
इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में कवि का पà¥à¤°à¥‡à¤® का निरंतर पà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¹ à¤à¤• पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤¦à¤¾à¤¯à¤• संदेश देता है और à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• रूप से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ को साà¤à¤¾ करता है।
Chapter 13 : Sumirini Ke Manke
"सà¥à¤®à¤¿à¤°à¤¿à¤¨à¥€ के मनके" में कवि 'पंडित चंदà¥à¤°à¤§à¤° शरà¥à¤®à¤¾ गà¥à¤²à¥‡à¤°à¥€ (Pandit Chandradhar Sharma Guleri)' ने माला के मणकों का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— किया है, जहाठमणके वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के जीवन के विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥‡ हैं। यह कविता वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के जीवन में आठसंघरà¥à¤·à¥‹à¤‚ और सà¥à¤–-दà¥à¤ƒà¤– के अनà¥à¤à¤µà¥‹à¤‚ की महतà¥à¤¤à¤¾ को समà¤à¤¾à¤¤à¥€ है। मणकों को à¤à¤•-à¤à¤• करके सà¥à¤®à¤¿à¤°à¤¨à¥€ की माला में पिरोना आतà¥à¤®à¤¾à¤¨à¥à¤à¤µ और जीवन की यातà¥à¤°à¤¾ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है।
इसमें कवि ने यह संदेश दिया है कि पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• अनà¥à¤à¤µ हमें जीवन में कà¥à¤› नया सिखाता है और उसे आतà¥à¤®à¤¸à¤¾à¤¤ करके हम अपने जीवन को और à¤à¥€ सà¥à¤‚दर बना सकते हैं।
Chapter 14 : Kachcha Chittha
"कचà¥à¤šà¤¾ चिटà¥à¤ ा" में जीवन की सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆà¤¯à¥‹à¤‚ का खà¥à¤²à¤¾à¤¸à¤¾ किया गया है। यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ और सामाजिक ढाà¤à¤šà¥‡ की कचà¥à¤šà¥€ सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆà¤¯à¥‹à¤‚ को उजागर करता है। इसमें बताया गया है कि जीवन में हर वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की अपनी कहानी होती है, जो अकà¥à¤¸à¤° सामाजिक दबावों और छिपी हà¥à¤ˆ इचà¥à¤›à¤¾à¤“ं से à¤à¤°à¥€ होती है। इस रचना के माधà¥à¤¯à¤® से लेखक 'बà¥à¤°à¤œà¤®à¥‹à¤¹à¤¨ वà¥à¤¯à¤¾à¤¸ (Brajmohan Vyas)' ने दिखाया है कि किस तरह इंसान की असली पहचान और उसकी सचà¥à¤šà¤¾à¤ˆ को समाज के ढोंग और दिखावे के कारण दबा दिया जाता है।
यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ सामाजिक परिदृशà¥à¤¯ का सजीव चितà¥à¤°à¤£ पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करता है।
Chapter 15 : Sanvadiya
संवदिया 'फणीशà¥à¤µà¤°à¤¨à¤¾à¤¥ रेनू 'दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखित à¤à¤• संवेदनशील और मारà¥à¤®à¤¿à¤• कहानी है जो गà¥à¤°à¤¾à¤®à¥€à¤£ à¤à¤¾à¤°à¤¤ की सजीव à¤à¤²à¤• पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करती है। यह कहानी समाज के निमà¥à¤¨ वरà¥à¤—, विशेषकर संवदिया समà¥à¤¦à¤¾à¤¯, के जीवन के संघरà¥à¤·à¥‹à¤‚ और उनकी वà¥à¤¯à¤¥à¤¾ को उजागर करती है।
संवदिया à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ है जिसका काम किसी के निधन पर गाà¤à¤µ में सूचना देना और अंतिम संसà¥à¤•ार की पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ में सहयोग करना होता है। कहानी का मà¥à¤–à¥à¤¯ पातà¥à¤° à¤à¤• गरीब, समाज दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ उपेकà¥à¤·à¤¿à¤¤ संवदिया है, जो अपने कारà¥à¤¯ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ निषà¥à¤ ावान और समरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ है। समाज में उसकी à¤à¥‚मिका महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ होते हà¥à¤ à¤à¥€ उसे हेय दृषà¥à¤Ÿà¤¿ से देखा जाता है। उसका काम उसे à¤à¤• तरह से मृतà¥à¤¯à¥ का दूत बनाता है, जिससे समाज में उसके पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अजीब-सी दूरी और उदासीनता है।
रेनू ने इस पातà¥à¤° के माधà¥à¤¯à¤® से न केवल समाज की संरचना को पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨à¤¾à¤‚कित किया है, बलà¥à¤•ि उस वरà¥à¤— का दरà¥à¤¦ और उसकी आंतरिक पीड़ा à¤à¥€ उकेरी है, जो सदैव हाशिठपर रहता है। संवदिया का जीवन संघरà¥à¤·à¤ªà¥‚रà¥à¤£ है; वह आरà¥à¤¥à¤¿à¤• अà¤à¤¾à¤µ, सामाजिक तिरसà¥à¤•ार और à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• अकेलेपन का सामना करता है। अपनी परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में à¤à¥€ वह दूसरों की सहायता करने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करता है, लेकिन उसका कारà¥à¤¯ केवल दà¥à¤– और मृतà¥à¤¯à¥ के समय याद किया जाता है।
इस कहानी में रेनू ने समाज के उस संवेदनहीन पहलू को उजागर किया है जहाठनिमà¥à¤¨ वरà¥à¤— के लोगों का महतà¥à¤µ केवल उनके काम तक सीमित रहता है। संवदिया का जीवन समाज के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ à¤à¤• कटॠसतà¥à¤¯ और हमारी संवेदनाओं को à¤à¤•à¤à¥‹à¤°à¤¨à¥‡ वाला पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। रेनू की लेखनी इस वरà¥à¤— के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ सहानà¥à¤à¥‚ति और मानवीय दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण अपनाने का संदेश देती है, जिससे यह कहानी à¤à¤• सशकà¥à¤¤ सामाजिक दसà¥à¤¤à¤¾à¤µà¥‡à¤œ बन जाती है।
Chapter 16 : Gandhi, Nehru, aur Yasser Arafat
à¤à¥€à¤·à¥à¤® साहनी दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखित "आज के अतीत" के अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ "गाà¤à¤§à¥€, नेहरू और यासà¥à¤¸à¥‡à¤° अराफ़ात" में लेखक ने महातà¥à¤®à¤¾ गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और फिलिसà¥à¤¤à¥€à¤¨à¥€ नेता यासà¥à¤¸à¥‡à¤° अराफ़ात के साथ बिताठअपने जीवन के कà¥à¤› अनमोल और यादगार कà¥à¤·à¤£à¥‹à¤‚ का वरà¥à¤£à¤¨ किया है। इसमें उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने इन महान नेताओं के वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ, उनके विचारों और उनसे मिलने के दौरान अनà¥à¤à¤µ किठगठà¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• और वैचारिक पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥‹à¤‚ को साà¤à¤¾ किया है।
इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में à¤à¥€à¤·à¥à¤® साहनी ने महातà¥à¤®à¤¾ गांधी के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ अपने गहरे आदर और शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾ को उजागर किया है। गांधीजी की सादगी, अनà¥à¤¶à¤¾à¤¸à¤¨ और अहिंसा के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ उनकी अडिग निषà¥à¤ ा ने लेखक को बहà¥à¤¤ पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ किया। साहनी बताते हैं कि गांधीजी का वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ इतना पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ था कि उनके आस-पास के लोग सहज ही उनकी ओर आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ हो जाते थे। गांधीजी की हर छोटी-सी बात में à¤à¥€ उनके महान आदरà¥à¤¶ à¤à¤²à¤•ते थे, और उनके विचारों ने साहनी के सोचने-समà¤à¤¨à¥‡ के तरीके को नया आयाम दिया।
पंडित नेहरू के साथ बिताठगठकà¥à¤·à¤£à¥‹à¤‚ में साहनी ने नेहरूजी की विदà¥à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾, सहृदयता और दूरदरà¥à¤¶à¤¿à¤¤à¤¾ को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¯à¤¾ है। नेहरूजी का वà¥à¤¯à¤µà¤¹à¤¾à¤°, उनके विचार, और à¤à¤¾à¤°à¤¤ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ उनका समरà¥à¤ªà¤£ साहनी को गहराई से पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ करता है। नेहरूजी का दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण हमेशा पà¥à¤°à¤—तिशील और à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ को धà¥à¤¯à¤¾à¤¨ में रखते हà¥à¤ होता था, जिससे साहनी को à¤à¥€ अपने लेखन और सामाजिक दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण में पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ मिली।
यासà¥à¤¸à¥‡à¤° अराफ़ात से जà¥à¤¡à¤¼à¥€ उनकी यादें इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ का à¤à¤• विशेष हिसà¥à¤¸à¤¾ हैं। अराफ़ात, जो फिलिसà¥à¤¤à¥€à¤¨à¥€ सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ संगà¥à¤°à¤¾à¤® के नायक थे, का वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ साहनी के लिठसाहस और संघरà¥à¤· का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• था। अराफ़ात की जà¥à¤à¤¾à¤°à¥‚ और दृढ़ता à¤à¤°à¥€ छवि ने साहनी को पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ किया। अराफ़ात के साथ उनके पल संघरà¥à¤· और सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ के जजà¥à¤¬à¥‡ को समà¤à¤¨à¥‡ और महसूस करने का मौका देते हैं।
इस पà¥à¤°à¤•ार, इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में à¤à¥€à¤·à¥à¤® साहनी ने इन तीन महान नेताओं के साथ अपने अनà¥à¤à¤µ साà¤à¤¾ किठहैं, जो उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपने जीवन और लेखन में à¤à¤• नया दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ करते हैं। ये नेता उनकी नजर में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ आदरà¥à¤¶à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• हैं—गांधीजी अहिंसा और सतà¥à¤¯ के, नेहरूजी आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता और राषà¥à¤Ÿà¥à¤°à¤¨à¤¿à¤°à¥à¤®à¤¾à¤£ के, और अराफ़ात सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ के लिठसंघरà¥à¤· के। इस पà¥à¤°à¤•ार, यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ साहनी के विचारों और उनके दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण को विसà¥à¤¤à¤¾à¤° देता है और उनके पाठकों को इन महान नेताओं के आदरà¥à¤¶à¥‹à¤‚ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ जागरूक बनाता है।
Chapter 17 : Sher, Pahchan, Char Hath aur Sajha
असगर वजाहत की चार लघà¥à¤•थाà¤à¤—शेर, पहचान, चार हाथ, और साà¤à¤¾—समानता और वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ समाज के दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण को गहरे और पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• तरीके से उजागर करती हैं। ये कहानियाठसामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾, सतà¥à¤¤à¤¾, पूà¤à¤œà¥€à¤µà¤¾à¤¦ और किसानों के संघरà¥à¤· पर à¤à¤• तीखी नज़र डालती हैं।
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शेर
यह कहानी वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ की शकà¥à¤¤à¤¿ और उसके कà¥à¤°à¥‚र चेहरे का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है। यहाठशेर को à¤à¤¸à¤¾ अहिंसावादी और नà¥à¤¯à¤¾à¤¯à¤ªà¥à¤°à¤¿à¤¯ दिखाया गया है कि सà¤à¥€ जानवर इसके पेट में किसी न किसी पà¥à¤°à¤²à¥‹à¤à¤¨ में समाते चले जाते हैं। लेकिन जब लेखक खà¥à¤¦ इसमें पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ करने से मना करता है, तो शेर अपनी असली कà¥à¤°à¥‚रता दिखाकर उसे दबाने के लिठà¤à¤ªà¤Ÿà¤¤à¤¾ है। असल में, यह सतà¥à¤¤à¤¾ का चेहरा है जो शांत और विनमà¥à¤° तब तक रहती है जब तक लोग उसकी आजà¥à¤žà¤¾ मानते रहें। लेकिन जैसे ही कोई उसकी वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ पर सवाल उठाता है, वह आकà¥à¤°à¤¾à¤®à¤• हो जाती है। इस पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• के माधà¥à¤¯à¤® से लेखक ने सतà¥à¤¤à¤¾ के ढोंग पर कटाकà¥à¤· किया है, जो दिखती अहिंसक है पर अंदर से कà¥à¤°à¥‚रता से à¤à¤°à¥€ होती है।
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पहचान
पहचान में à¤à¤• à¤à¤¸à¤¾ राजा है जिसे वही जनता पसंद आती है जो न देखती है, न सà¥à¤¨à¤¤à¥€ है और न बोलती है। इस पà¥à¤°à¤•ार वह जनता को छदà¥à¤® विकास और पà¥à¤°à¤—ति के नाम पर à¤à¥à¤°à¤®à¤¿à¤¤ रखता है। à¤à¥‚मंडलीकरण के दौर में राजा अपने लाठके लिठजनता को सपनों का à¤à¤¾à¤‚सा देता है, लेकिन असल में वह संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत करता जाता है। इसी वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ में वह जनता को à¤à¤•जà¥à¤Ÿ होने से रोकता है और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी पहचान और अधिकार से वंचित रखता है। यह कहानी बताती है कि किस पà¥à¤°à¤•ार सतà¥à¤¤à¤¾ लोगों की आज़ादी को कà¥à¤šà¤²à¤¤à¥€ है और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ विकास के नाम पर à¤à¤Ÿà¤•ाती है।
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चार हाथ
चार हाथ में पूà¤à¤œà¥€à¤µà¤¾à¤¦à¥€ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ का वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤• चितà¥à¤°à¤£ है, जिसमें मज़दूरों का शोषण होता है। पूà¤à¤œà¥€à¤ªà¤¤à¤¿ वरà¥à¤— मजदूरों को बà¥à¤°à¥€ तरह से पंगॠबनाने के लिठतरह-तरह के तरीके अपनाता है और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ अपनी असà¥à¤®à¤¿à¤¤à¤¾ से वंचित कर देता है। उनकी मेहनत का सही मूलà¥à¤¯ न देकर, उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ कम वेतन पर काम करवाया जाता है। यह कहानी दिखाती है कि पूà¤à¤œà¥€à¤µà¤¾à¤¦à¥€ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ में मज़दूर à¤à¤• मशीनी पà¥à¤°à¥à¤œà¥‡ की तरह हैं, जो अपने असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ की लाचारी में केवल आधी मज़दूरी पर à¤à¥€ काम करने को मजबूर हैं।
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साà¤à¤¾
साà¤à¤¾ कहानी में किसानों का शोषण दिखाया गया है, जहाठगाà¤à¤µ के धनाढà¥à¤¯ वरà¥à¤— और उदà¥à¤¯à¥‹à¤—पति किसानों को धोखे में रखकर उनकी सारी फसल और मेहनत हड़प लेते हैं। साà¤à¤¾ खेती के नाम पर, किसानों को छल से अपनी मेहनत से अरà¥à¤œà¤¿à¤¤ धन और उपज से वंचित कर दिया जाता है। यहाठहाथी उस पà¥à¤°à¤à¥à¤¤à¥à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ वरà¥à¤— का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है, जो किसानों की मेहनत को निगल जाता है। यह कहानी किसानों की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ को उजागर करते हà¥à¤ सà¥à¤µà¤¤à¤‚तà¥à¤°à¤¤à¤¾ के बाद उनकी बदहाली के कारणों की पड़ताल करती है।
असगर वजाहत की ये लघà¥à¤•थाà¤à¤ हमारे समाज में विà¤à¤¿à¤¨à¥à¤¨ मà¥à¤¦à¥à¤¦à¥‹à¤‚ को पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ तरीके से उजागर करती हैं, जो छातà¥à¤°à¥‹à¤‚ के लिठसोचने का à¤à¤• महतà¥à¤µà¤ªà¥‚रà¥à¤£ पहलू बन सकती हैं। ये कहानियाठवà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ और वरà¥à¤— संघरà¥à¤· को समà¤à¤¨à¥‡ में सहायक हैं, और आपके छातà¥à¤°à¥‹à¤‚ के लिठसराहनीय अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ बन सकती हैं, जो सारà¥à¤¥à¤• तरीके से जà¥à¤žà¤¾à¤¨ और जागरूकता पà¥à¤°à¤¦à¤¾à¤¨ करती हैं।
Chapter 18 : Jahan Koi Wapsi Nahi
निरà¥à¤®à¤² वरà¥à¤®à¤¾ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित सिंगरौली: जहाठकोई वापसी नहीं à¤à¤• मारà¥à¤®à¤¿à¤• रचना है, जो हमें आधà¥à¤¨à¤¿à¤• जीवन की विडंबनाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच के संघरà¥à¤· को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥€ है। इस कहानी में लेखक ने सिंगरौली नामक à¤à¤• छोटे से कसà¥à¤¬à¥‡ की पृषà¥à¤ à¤à¥‚मि में वहां के बदलते परिवेश, परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£à¥€à¤¯ समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं, और सà¥à¤¥à¤¾à¤¨à¥€à¤¯ जनजीवन पर पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ का वरà¥à¤£à¤¨ किया है।
इस रचना में लेखक ने औदà¥à¤¯à¥‹à¤—िकीकरण और आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ीकरण के नाम पर हो रहे परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£à¥€à¤¯ विनाश को पà¥à¤°à¤®à¥à¤–ता से उठाया है। सिंगरौली जैसे सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ में औदà¥à¤¯à¥‹à¤—िक परियोजनाओं की वजह से वहां की पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक सà¥à¤‚दरता और वातावरण दूषित हो गठहैं। लेखक दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¤¾ है कि कैसे विकास की इस अंधी दौड़ में वहां के मूल निवासी अपनी जड़ों से उखड़ते जा रहे हैं और कैसे उनका सांसà¥à¤•ृतिक और सामाजिक जीवन असà¥à¤¤-वà¥à¤¯à¤¸à¥à¤¤ हो गया है।
कहानी के माधà¥à¤¯à¤® से निरà¥à¤®à¤² वरà¥à¤®à¤¾ ने यह पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨ उठाया है कि कà¥à¤¯à¤¾ विकास के नाम पर हमें अपने पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक संसाधनों और मूल निवासियों के जीवन को बरà¥à¤¬à¤¾à¤¦ कर देना चाहिà¤? उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने यह à¤à¥€ बताया कि आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता और औदà¥à¤¯à¥‹à¤—िकीकरण के पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µ से सिंगरौली जैसे छोटे कसà¥à¤¬à¥‹à¤‚ में न केवल परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£à¥€à¤¯ संतà¥à¤²à¤¨ बिगड़ता है, बलà¥à¤•ि वहां के निवासियों का जीवन à¤à¥€ संकट में पड़ जाता है।
इस कहानी का संदेश है कि विकास की आवशà¥à¤¯à¤•ता तो है, लेकिन यह विकास संतà¥à¤²à¤¿à¤¤ और परà¥à¤¯à¤¾à¤µà¤°à¤£ के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ संवेदनशील होना चाहिठताकि आने वाली पीढ़ियों को à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤•ृतिक संसाधनों का लाठमिल सके। सिंगरौली: जहाठकोई वापसी नहीं पाठकों को यह सोचने पर विवश करता है कि हमें किस पà¥à¤°à¤•ार का विकास चाहिठऔर यह किस हद तक मानवीय और नैतिक रूप से सà¥à¤µà¥€à¤•ारà¥à¤¯ है।
Chapter 19 : Yathasmay Rochte Vishwam
रामविलास शरà¥à¤®à¤¾ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित यथासà¥à¤®à¥ˆ रोचते विशà¥à¤µà¤®à¥ तथेदं परिवरà¥à¤¤à¤¤à¥‡ में लेखक 'साहितà¥à¤¯ समाज का दरà¥à¤ªà¤£ होता है' को नकारते हà¥à¤ कहता है की लेखक और साहितà¥à¤¯ का काम दरà¥à¤ªà¤£ दिखाना नहीं, बलà¥à¤•ि अपने कलम से à¤à¤• नयी दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का निरà¥à¤®à¤¾à¤£ करना होता है। इसलिठपà¥à¤°à¤œà¤¾à¤ªà¤¤à¤¿ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤¾ से à¤à¥€ कवि और लेखकों की तà¥à¤²à¤¨à¤¾ की जाती है कि कैसे कवि को जो ठीक लगता है वैसे ही वो लेखनी के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ संसार को बदलता है।
à¤à¤¸à¥‡ ही कवि और लेखकों की अब समाज में कमी है और वो सिरà¥à¤« दरà¥à¤ªà¤£ दिखने वाले बन कर रह गठहैं न की समाज को परिवरà¥à¤¤à¤¿à¤¤ करने की कोशिश कर रहे हैं जैसा की ऋषि वालà¥à¤®à¥€à¤•ि, à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥‡à¤¨à¥à¤¦à¥ हरिशà¥à¤šà¤‚दà¥à¤°, सूर-तà¥à¤²à¤¸à¥€-मीरा-कबीर , तेलà¥à¤—ॠवीरेश लिंगम, तमिल तिरà¥à¤µà¤²à¥à¤²à¥à¤µà¤°, वलà¥à¤²à¤¤à¥‹à¤², चंडीदास, रविंदà¥à¤°à¤¨à¤¾à¤¥ टैगोर इतà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¿ ने किया था।
Chapter 20 : Doosra Devdas
ममता कालिया दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ रचित दूसरा देवदास à¤à¤• आधà¥à¤¨à¤¿à¤• दृषà¥à¤Ÿà¤¿à¤•ोण से पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ कहानी है जो शरतचंदà¥à¤° चटà¥à¤Ÿà¥‹à¤ªà¤¾à¤§à¥à¤¯à¤¾à¤¯ की पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ कृति देवदास से अलग, आज के समाज के वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤•ताओं को दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¥€ है। इस कहानी में लेखक ने पारंपरिक देवदास की पà¥à¤°à¥‡à¤®-वà¥à¤¯à¤¥à¤¾ से हटकर à¤à¤• नठतरह के देवदास को चितà¥à¤°à¤¿à¤¤ किया है, जो बदलते समाज, रिशà¥à¤¤à¥‹à¤‚, और वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ की नई परिà¤à¤¾à¤·à¤¾ को पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤ करता है।
कहानी का नायक 'देवदास' नहीं बलà¥à¤•ि à¤à¤• आधà¥à¤¨à¤¿à¤• यà¥à¤µà¤• है, जो अपने करियर, आरà¥à¤¥à¤¿à¤• समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं और सामाजिक अपेकà¥à¤·à¤¾à¤“ं के बीच उलà¤à¤¾ हà¥à¤† है। उसके जीवन में पारो और चंदà¥à¤°à¤®à¥à¤–ी जैसे पातà¥à¤° होते हैं, लेकिन उनकी à¤à¥‚मिकाà¤à¤ अलग हैं और कहानी की पृषà¥à¤ à¤à¥‚मि à¤à¥€ समकालीन समाज पर आधारित है। इस देवदास के संघरà¥à¤· पà¥à¤°à¥‡à¤® की विफलता से अधिक, समाज की वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤•ताओं, आरà¥à¤¥à¤¿à¤• संघरà¥à¤·à¥‹à¤‚ और वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त असà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¾à¤“ं से हैं।
इस कहानी में ममता कालिया ने यह दिखाने की कोशिश की है कि कैसे समाज के दबाव और मानसिक उलà¤à¤¨à¥‡à¤‚ à¤à¤• वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ को देवदास बना देती हैं। यह देवदास न तो शराब में अपनी मà¥à¤•à¥à¤¤à¤¿ खोजता है, न ही वह अपने दà¥à¤–ों में डूबता है। बलà¥à¤•ि, वह अपने असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ के पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨à¥‹à¤‚, समाज की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ और वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤—त असà¥à¤°à¤•à¥à¤·à¤¾à¤“ं का सामना करता है।
कहानी यह संदेश देती है कि आज के समय में असल संघरà¥à¤· बाहरी नहीं बलà¥à¤•ि वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ के à¤à¥€à¤¤à¤° है, जहाठउसे समाज की अपेकà¥à¤·à¤¾à¤“ं और अपनी इचà¥à¤›à¤¾à¤“ं के बीच संतà¥à¤²à¤¨ बनाना पड़ता है। ममता कालिया ने अपने लेखन के माधà¥à¤¯à¤® से यह दिखाने की कोशिश की है कि आधà¥à¤¨à¤¿à¤• समय का देवदास अपनी परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ से हार मानकर खà¥à¤¦ को बरà¥à¤¬à¤¾à¤¦ नहीं करता, बलà¥à¤•ि वह नई दिशा खोजता है और अपने असà¥à¤¤à¤¿à¤¤à¥à¤µ की लड़ाई लड़ता है।
दूसरा देवदास आज के यà¥à¤µà¤¾à¤“ं की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚, संघरà¥à¤·à¥‹à¤‚ और सामाजिक दबावों को पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¬à¤¿à¤‚बित करता है, और यह हमें सोचने पर विवश करता है कि सचà¥à¤šà¥‡ पà¥à¤°à¥‡à¤® और आतà¥à¤®-समà¥à¤®à¤¾à¤¨ की परिà¤à¤¾à¤·à¤¾ कà¥à¤¯à¤¾ है।
Chapter 21 : Kutaj
"कà¥à¤Ÿà¤œ" à¤à¤• परà¥à¤µà¤¤à¥€à¤¯ वनसà¥à¤ªà¤¤à¤¿ का नाम है, जिसका पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— इस अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ में पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤•ातà¥à¤®à¤• रूप में किया गया है। कà¥à¤Ÿà¤œ का वृकà¥à¤· अपने आप में जीवन के संघरà¥à¤· और विपरीत परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का पà¥à¤°à¤¤à¥€à¤• है, जो कठिनाईयों के बावजूद खिलता है और अपनी सà¥à¤—ंध बिखेरता है। इसी पà¥à¤°à¤•ार से यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ यह संदेश देता है कि जीवन में विपरीत परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ के बावजूद हमें अपने आतà¥à¤®-समà¥à¤®à¤¾à¤¨ को बनाठरखना चाहिठऔर अपने कारà¥à¤¯à¥‹à¤‚ के माधà¥à¤¯à¤® से दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ में अपनी पहचान बनानी चाहिà¤à¥¤
हजारी पà¥à¤°à¤¸à¤¾à¤¦ दà¥à¤µà¤¿à¤µà¥‡à¤¦à¥€ (Hazari Prasad Dwivedi) दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ लिखित यह अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ विपरीत परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में धैरà¥à¤¯, संयम और आतà¥à¤®-समà¥à¤®à¤¾à¤¨ का महतà¥à¤µ दरà¥à¤¶à¤¾à¤¤à¤¾ है।